Sunday, 22 January 2017

पहचान


आज मन किया कि चलो एक कंकर फैंकते है अपने खयालो की दरियां में , की अहसास तो हो की  ज़िंदा हूँ मैं अभी।

आज खुद को देखा अपने ही आईने में जब निष्ठां को अपने ही ख्यालों में उलझते हुए देखा. सुबह से ही गुमसुम थी निष्ठा  आज. बहुत कुरेदा , पर कुछ नहीं बोली छोरी।  पर बिन कहे उसकी उलझन समझ में आ ही गयी.

आखिरी साल है निष्ठा का अपने कॉलेज में।  अब ग्रेजुएट हो जायेगी।  कितना गर्व होता था ग्रेजुएट होने पे आज से ३० साल पहले।  पर अब हालात ये हो गए हैं की ग्रेजुएट होने पे एक नई उलझन में उलझ जाते हैं।  ज़िन्दगी डराने सी लगती है. आगे का रास्ता क्या हो, किस तरफ हो , समझ में ही नहीं आता.

30 साल पहले मैं खुद इसी उलझन में था।  समझ में बस यही था कि  बिज़नस करना है।  क्या और कौन सा , नहीं पता।  बस पता था सिर्फ इतना कि अगर लाल रंग की issuzu  लेनी है तो बिज़नस करना है. कम  समझ और अनदेखे और अनसुलझे रास्ते पे चलने से ये हुआ कि २० साल लग गए ज़िन्दगी में स्टेबिलिटी लाने में।  बावजूद इसके कि ability बहुत थी।

किसी टूटे हुए मकान की तरह हो गयी थी ज़िन्दगी , जिसमे कोई रहता भी नहीं था और  कमबख्त बिकता भी नहीं था।  वजह सिर्फ एक ही थी कि बिन जाने और बिन खुद से पूछे चल दिए थे ज़िन्दगी के उस रास्ते पे , जिसका लक्ष्य ही अनजान था.  खुद को सँवारे बिना अपने सपनो को समेटने निकल पड़े थे।  इतनी भी समझ नहीं थी कि ज़िन्दगी में लाल issuzu  कार से जायदा  stability  ज़रूरी है. जब तक समझ आया तब तक मंजिले ख्वाब बन के रह गयी।

आज जब भी निष्ठा को देखता हूँ तो खुद का आईना ही नज़र आता है. पर आज एक बात समझ आयी है , कि इंसान को नाम और पहचान चाहे छोटी रखनी पड़े , मगर खुद कि रखनी चाहिए।

ज़रूरत चाहते रखने कि नहीं है , बल्कि ज़रूरत चाहतों कि इन्तहा को समझने की है।  इंसान कि खवाइशों कि कोई इंतिहा नहीं होती. ये तो उस पतंग कि तरह होती है कि ज़रा सी हवा भी लग जाए तो ये इंसान को ही हवा में उड़ाने लगती हैं।

समझना होगा निष्ठा को कि ख्वाबो से बड़े उसूलों को रखना चाहिए।  अगर आप अपने उसूलों के साथ सफ़र पे चलोगी तो मंजिल तक ज़रूर पहुँचोगी।  नहीं तो दुनिया की इस अलाव में रोज़ जलना पड़ेगा और खुद के सपनो का जिंदगी भर पीछा करना पड़ेगा।

समझना होगा उसको कि अपनी एबिलिटी ( क़ाबलियत ) के साथ  जिंदगी में स्टेबिलिटी (ठहराव ) की भी ज़रूरत है। पर एक पड़ाव पे ठहरना नहीं है , बल्कि गुज़र जाना है।    समझना होगा उसको कि बड़ा बनने के लिए उसको छोटे छोटे कदम उठाने होंगे. जिंदगी के सफ़र में गर वो शिकायते दर्ज करवाने जायेगी तो उसको सिर्फ कतारें ही मिलेगी।  गर उसको शिकायत करनी है तो सिर्फ खुद से करनी सीखनी होगी।

जिंदगी में हर रोज़ गर नये दिये जलाने हैं तो उसको दिल के कोने में छुपी हुई उम्मीद कि लों को बुझने नहीं देना है।  नासमझी करने से नहीं, खुद से उम्मीद न रखने से डरना है उसको।  जिंदगी की उलझनों से जल्द से जल्द सुलह करना सीखना होगा उसको , नहीं तो जिंदगी के पडावों को मंजिल समझ के जिंदगी के सकून को खोना पड़ सकता है।

आम तौर पे आधी ख्वाइशों को हम अन्दर ही मार लेते हैं , और आधी को ज़माना मुक्कम्मल होने नहीं देता।  अपनी खवाइशों की लों को बुझने मत दो पर इतना खुदगर्ज़ न बनो कि दूसरों कि खवाइशों को कबूल न करो।  जिंदगी में खुद को इतना भला भी न बनाओ कि कोई आपको तवज्जो न दे , और इतने बुरे भी न बनो कि हर तरफ आपके ही चर्चे हों।

ये दुनिया बहुत बेरहम है।  गुजारिश करनी है तो खुद से करनी होगी।  बीत जाने से पहले हर लम्हा को जीना होगा तभी तुम्हारे वजूद का अहसास दुनिया में होगा।  जिंदगी का सफ़र में उनको साथ लो जिनके साथ चल के सकून मिले। ज़रूरी नहीं जिनके साथ ताल्लुक हो उनके साथ चलो।  और ख्याल रखना क्यूंकि मौज में इंसान औकात क्या मौत भी भूल जाता है।

आखिर में एक बात याद रखना , कभी जिंदगी का मज़ाक नहीं बनाना क्यूंकि जिंदगी सिर्फ मौका देती है धोखा नहीं !

अतुल