Tuesday, 25 September 2012

अपने

आज सुबह जल्दी 7 बजे ही उठ गया। ..... जी हाँ बहुत कम ही मैंने सुबह के 7 बजते देखे हैं। अब नींद टूट ही गई तो सोचा आज ज़रा बीवी को भी खुश कर दे सो चल पड़ा घर के सामने वाले उद्यान में। अभी 3 चक्कर ही लगा पाया की पीछे वाले गर्ग साहिब की खुरदरी आवाज़ से ध्यान बंट  गया। गर्ग साहिब अपने सपुत्र के साथ टहल रहे थे। यकायक ही उन पर नज़र पड़  गई और नज़रे मिलते ही शिष्टाचार वश राम- राम भी हो गई।

नहीं बेटा , गर्ग साहिब फिर बोले, अभी नहीं !
पापा , मेरे दोस्त के पापा ने बुक करवा दिया है ..... मैं तो उस पुराने के साथ INSULT  feel  करूँगा .
तो ...... गर्ग साहिब बोले ...... अभी 4 महीने पहले तो ले कर दिया है , दसवी पास कर ले .... उसके बाद।
नहीं पापा .... वोह मेरे दोस्तों के बीच सबसे बड़ा हो जाएगा। मान जाओ न पापा ............ plzzz , बेटा अपनी जुबान में इतनी मिठास और विनय से बोला की हर कोई पिघल जाए।

गर्ग जी , मैं बोला , क्या चाहिए रमण को ......

कुछ नहीं कथूरिया जी , वोह आया है न नया I -PAD , बस उसकी फरमाइश है बरखुरदार की . फिर कुछ सोच कर रमण को बोले , चल अब तू मुझे सैर करने दे , कल ले दूंगा।
रमण ख़ुशी में चिल्ला कर अपने पिता को thank you  बोल कर भाग लिया घर की तरफ जैसे उसका कोई operation  complete  हो चूका हो। उस 16 साल के लड़के के चेहरे की चमक देखते ही बनती थी। और उस चमक  की  चमकाहट  में गर्ग साहिब के चेहरे में बेटे के प्रति वात्सल्य उमड़ पड़ा .

कथूरिया जी , गर्ग साहिब मेरी तरफ मुताफिक हो कर बोले , हमारे बच्चे जब अन्दर से खुश होते हैं तो दिल में एक ढंडक सी होती है। अब इतना काम करते है , मेहनत  करते है , किसके लिए ? , गर्ग साहिब अपने ही रौ  में  बोलते चले जा रहे थे , इन बच्चो के लिए ही न ?  क्यूँ कथूरिया साहिब ? जैसे गर्ग साहिब मुझसे अपनी बात के  लिए सहमती मांग रहे हो मेरी।
हूँ ...... इतना ही बोल सका मैं , और अपने कदम थोड़े तेज़ कर लिये .

जितनी तेज़ी से पैर चल रहे थे उस से 1000 गुना तेज़ी से दिमाग में विचार। अभी 3 महीने पहले ही की तो बात है जब गर्ग जी ने रमण को उसके जन्मदिन पर उपहार में I -PAD  दिया था। वोह इतनी जल्दी पुराना पड़  गया . या बच्चे की जिद के सामने गर्ग जी ने समर्पण कर दिया ....... क्यूँ ?....... प्यार के लिए ....... पर यह कैसा प्यार , जो आप को किसी का अपना बनाने की बजाये उसको अपने से दूर ले जाए .

बिलकुल , गर्ग साहिब अनजाने में अपने रमण को अपने से दूर ले जा रहे हैं . प्यार की और लाड़  की परिभाषायें  ही बदलती जा रही है। आज कल माता पिता का अपने बच्चो के प्रति प्यार कभी कभी खुद को समाज के सामने अपनी प्रतिष्ठा को दर्शाने का मोका बन जाता है।
हम अपना परिवार से ही अपने समाज का निर्माण करते हैं। पर क्या हम ऐसा समाज देना चाहते है देश को , जिसमे हम सबको अपने प्यार या इज्ज़त को अपनी खुद की प्रतिष्ठा के तराजू पर तोलना पड़े . हम अनजाने में ही अपनी भावी पीड़ियो  की जड़ो को कमज़ोर कर रहे हैं। हम उनको सिर्फ इस काबिल बना रहे है की जिस चीज़ की तृष्णा हो , उसको किसी भी तरह से हासिल करो। बल्कि हमको उनको हासिल करने की मानसिकता से निकाल कर अपनी खुद की काबलियत को improve  करना सिखाना चाहिए।

यह हासिल करने की मानसिकता की वज़ह से ही आज हम अपनी अन्दर की ख़ुशी को कहीं खो चुके है। हम अपने बच्चो को किस तरह की ख़ुशी देना चाहते हैं , यह तय हम ही कर सकते हैं। परन्तु हम खुद इतने स्वार्थी हैं की हम वोह ही तय  करते हैं जिसमे हम को खुद प्रसन्ता  मिलती हो।

आजकल किसी भी तरीके से प्राप्त की हुई सम्पनता ही ख़ुशी का पैमाना बन चूका है . नैतिक मूल्य या अच्छा चरित्र की ज़रूरत अब पीछे हो गई है। सोचता हूँ की हम अपनी भावी पीड़ी को क्या दे कर जा रहे है ?
आज अगर महतवपूर्ण है सिर्फ खुद की सम्पन्ता। ज़रूरी है यह , बहुत ज़रूरी है , परन्तु इसके लिए जो हम कीमत चूका रहे है , क्या वोह सही कीमत है?

हम अपने बच्चो की अगर हर छोटी , सही या गलत, बात मानते गये , यह सोच कर की हम किसके लिए इतना काम कर रहे हैं , तो हम अनजाने में उनको कमज़ोर ही बना रहे है। बच्चो को देना कोई बुरी बात नहीं है , बल्कि तरीके से और सही समय पर देना जयादा महत्वपूर्ण है।

नैतिकता या सामाजिक मूल्यों की समझ बचपन की कच्ची उम्र में ही विकसित होती है। आजकल युवाओं में काबलियत की परिभाषा सिर्फ यह है की आपके पास कितनी information  है different  new  products  की . कारे , मोबाइल , music  systems और नये  नये  गजेट। पूरी की पूरी जिंदगी बिताने को तैयार है इन चीजों के लिए। अगर सच बोलू , अधिकतर युवा आजकल पड़े लिखे जाहिल हैं , जिनको जीवन की असली हकीकत का कोई आभास नहीं। रिश्तों की कोई अहमियत नहीं, अगर अहमियत है तो सिर्फ खुद की। स्वार्थ का चश्मा लगा रखा है।

रिश्तों की गर्माहट क्या होती है, एक छोटा सा उदहारण देना चाहता हूँ . CA  की शिक्षा प्राप्त करते हुए कई साथी बने। उनमे से मेरे 2 दोस्त राजीव और संजीव आज भी इतने करीब है की 6 महीने या साल न भी मिले पर जब भी मिलते है उस गर्म्हाट के साथ जैसे हर हफ्ते मिलते हो। परन्तु कुछ साथी ऐसे भी है जो सिर्फ ज़ेहन में है पर कभी मुलाक़ात नहीं हुई जिंदगी के सफ़र में।

अचानक एक ऐसे ही मेरे साथी को किसी तरह से मेरे होने का पता चला इस धरती पर। जिस industry  में मैं हूँ , उसी industry की ऊँचाई  पर है वोह। बहुत छोटा हूँ मैं उसके सामने, पर उसने बिना कोई समय गवाये  मुझे न सिर्फ फ़ोन किया बल्कि अपने ऑफिस में बुलाया मिलने के लिये .एक पल भी नहीं सोचा उसने कि , कहीं मैं कोई advantage  ना  लेना शुरु कर दूँ . हम मिले , उसी गरमाहट  से , जिस से हम 20 साल पहले मिलते थे, घर गृहस्ती की बाते की , पर साथ में उन पलो को याद किया जिनको याद करके दिल थोडा बच्चा हो जाता है।

मैंने भी उसके बाद कभी कोशिश नहीं की उसकी company में किसी बिज़नस के लिये। यह सोच कर की कहीं सरदार को कोई प्रॉब्लम न हो जाए। आज भी ज्यादा बातें नहीं होती, मेरी ही  हिचक है , कहीं गलती से भी यह message  न चला जाए की कोई advantage  लेने की कोशिश कर रहा हूँ। पर मालूम है की अन्दर से रिश्तों की गर्माहट उतनी ही है।  किधर मिलते है ऐसे दोस्त ? बहुत कम ............

पर आजकल , रिश्ता वोह ही कामयाब है , जिसमे हर रिश्ते की कोई न कोई कीमत हो। अधिकतर युवा आजकल रोजाना आने वाले हालातों में सही निर्णय नहीं ले पाते। इसकी वजह यही है की हमने बचपन से ही उनमे सही चरित्र , दृढविशवास , विनर्मता और आत्मअनुशासन की अहमियत का अहसास नहीं करवाया।
उनकी हर इच्छा को प्यार और लगाव का हवाला दे कर पूरा किया, जिससे वोह थोड़े से अंदरूनी तौर पर कमज़ोर हो गए है।
हमे अपने बच्चो में हासिल करने की प्रवति नहीं , बल्कि प्राप्त करने की प्रवति विकसित करनी चाहिए। प्राप्त करने का मतलब है की वे खुद में आत्मस्वाभिमान लाये, और अपने हर उस लक्ष्य को प्राप्त करने का अनुभव विकसित करे जिससे वोह खुद अपने आप में एक मूल्यवान इंसान बने। इससे उनमे वोह शक्ति आयेगी  जिससे वोह अपनी आकंशा पर नियंत्रण करना सीख पायेंगे और कभी निराशा में नहीं डूबेंगे।

आसान लगने वाला रास्ता वास्तव में मुश्किल भी हो सकता है। बच्चे हमसे ही सीखते हैं सो हमारी जिम्मेवारी  जायेदा है उनका सही निर्माण करने में।
 एक कहानी याद आ रही है। एक छोटी सी लड़की हमेशा सबसे मीठा बोलती थी। सब उसकी मिठास से प्रभावित थे। किसी ने पुछा , तुमको यह तहज़ीब किसने सिखाई। लड़की बोली , किसी ने नहीं , मेरे घर में सब ऐसे ही बोलते है।
जैसे हम घर में दूसरों से वयवहार करेंगे , बच्चे भी वैसा ही करेंगे। बच्चो के उप्पर सबसे जायेदा  असर घर और school  के माहोल का होता है। अत: हम जिम्मेवार है सही school  के चुनाव में और घर के माहोल को बनाने में।
अपने बच्चो का सही विकास करना है तो ज़रूरी है की हम उन पर दुगना समय लगाये  और पैसा आधा ! बच्चो को रोज़ प्रेरित करने की जिम्मेवारी हमारी है जिस से उनमे सही विचार , संस्कार , अनुशासन , आत्मविशवास और नैतिक मूल्य का प्रवाह हो। रोज़ उनसे बाते करने से न सिर्फ उनकी जिज्ञासा शांत होगी बल्कि वोह आपके ज्यादा  करीब होंगे।
अगर हम उनको बाहारी  रूप से प्रेरित करेंगे तो वोह खुद बे खुद आंतरिक रूप से प्रेरित होंगे जो उनको खुद के सम्पूर्ण होने का अहसास दिलाएगा। हमको उनको यह नहीं सिखाना की " जो अच्छा  लगे वोह करो " परन्तु उनको बताना चाहिये  की जो ज़रूरी है वोह करना पसंद करो
.उनको जिम्मेवार बनाओ खुद के लिए,  परिवार के लिये , अपने काम के प्रति , अपने देश और समाज के प्रति और अपने भविष्य के प्रति। 
उनको मितव्यता का महत्व सिखाने की जिम्मेवारी हमारी है, इस से उनमे self control की भावना विकसित होगी। दिशा मिलेगी उनको दूरदर्शिता के साथ जिंदगी जीने की,  और उन्ही की जिंदगी में उनको पूरणता  का अर्थ समझ में आयेगा .
हमारे बच्चे ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है और सबसे बड़ी कमजोरी है। अत: हमारा कर्तव्य है की हम उनको अपनी प्रतिष्ठा दिखाने का जरिया न बनाये,  नहीं तो वही  बच्चे हमारी खुद की दुर्दशा का कारण बन जायेगे।

मेरे दादा जी ने मुझे एक चीज़ सिखाई थी : राजू, जब भी तुम कुछ खरीदने जाओ तो खुद से तीन सवाल करो ;
पहला: क्या मैं इस को खरीदने में खुद समर्थ हूँ ? कहीं मैं दुसरे के धन का इस्तमाल तो नहीं कर रहा हूँ।
           अगर इसका उत्तर हाँ में मिले तो खुद से दूसरा प्रश्न पूछो
दूसरा : क्या मुझे इसकी वास्तव में ज़रूरत है ? अगर इस का उत्तर भी हाँ में मिले तो आखिर में खुद से पूछो
तीसरा : क्या इसके बिना मेरा काम चल जायेगा ? और इस प्रश्न का उत्तर अगर "न" में मिले तो उस वस्तु  को      बिना  देर किये खरीद लो।

पर इसका मतलब यह नहीं की आप हमेशा ऐसा करो , कभी कभी खुद की और दुसरे की खुशी  के लिए आप थोडा सा, खुद को, वक़्त के हिसाब से बदल सकते हो। मन की प्रसन्ता  भी उतनी ज़रूरी है जितनी की मित्वयता
आप सेल्फ कण्ट्रोल से मितव्यता और मन की ख़ुशी में balance  बेठा सकते हो।

ज़रा सोचिये की आप अपनी संतान को क्या देना चाहते है ?  आपके पास सिर्फ 2 विकल्प हैं

हासिल करने की प्रवति या प्राप्त करने की क़ाबलियत !

अतुल




2 comments:


  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 14 मई 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. सुन्दर रचना ।

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