Thursday, 6 September 2012

उड़ान

पता नहीं कब जिंदगी की उठा पठक  से आज़ाद हो कर खुद को जी पायूँगा

मन तो कई उड़ान भरने की कल्पनाये करता है . पर जिंदगी की जिम्मेवारी  हमेशा पैरो में बेड़ियाँ दाल देती हैं

अकेलेपन का अहसास इतना है की सिर्फ खोकली हँसी और खोकली बाते ही कर के दूसरो को अपना समझने की हर बार भूल कर बैठता हूँ

चलो कल से अब अपने लिए जीते हुये अपनी सोच को शब्दों में उतारने की कोशिश करेंगे।

शाएद इस से ही दिल में जो एक अजीब सा बोझ है ..... कुछ हल्का हो जाए और इसी तरह पता नहीं की जिंदगी का कोई मकसद मिल जाये !

कोशिश यही रहेगी की हमेशा सकारत्मक बातें ही लिखू .

देखते हैं कल क्या रंग दिखाता है मुझको .

एक शेर याद आ रहा है ....

मैं हवा हूँ कौन वतन अपना , ढूड रहा हूँ चमन अपना !


 

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