Sunday, 22 January 2017

पहचान


आज मन किया कि चलो एक कंकर फैंकते है अपने खयालो की दरियां में , की अहसास तो हो की  ज़िंदा हूँ मैं अभी।

आज खुद को देखा अपने ही आईने में जब निष्ठां को अपने ही ख्यालों में उलझते हुए देखा. सुबह से ही गुमसुम थी निष्ठा  आज. बहुत कुरेदा , पर कुछ नहीं बोली छोरी।  पर बिन कहे उसकी उलझन समझ में आ ही गयी.

आखिरी साल है निष्ठा का अपने कॉलेज में।  अब ग्रेजुएट हो जायेगी।  कितना गर्व होता था ग्रेजुएट होने पे आज से ३० साल पहले।  पर अब हालात ये हो गए हैं की ग्रेजुएट होने पे एक नई उलझन में उलझ जाते हैं।  ज़िन्दगी डराने सी लगती है. आगे का रास्ता क्या हो, किस तरफ हो , समझ में ही नहीं आता.

30 साल पहले मैं खुद इसी उलझन में था।  समझ में बस यही था कि  बिज़नस करना है।  क्या और कौन सा , नहीं पता।  बस पता था सिर्फ इतना कि अगर लाल रंग की issuzu  लेनी है तो बिज़नस करना है. कम  समझ और अनदेखे और अनसुलझे रास्ते पे चलने से ये हुआ कि २० साल लग गए ज़िन्दगी में स्टेबिलिटी लाने में।  बावजूद इसके कि ability बहुत थी।

किसी टूटे हुए मकान की तरह हो गयी थी ज़िन्दगी , जिसमे कोई रहता भी नहीं था और  कमबख्त बिकता भी नहीं था।  वजह सिर्फ एक ही थी कि बिन जाने और बिन खुद से पूछे चल दिए थे ज़िन्दगी के उस रास्ते पे , जिसका लक्ष्य ही अनजान था.  खुद को सँवारे बिना अपने सपनो को समेटने निकल पड़े थे।  इतनी भी समझ नहीं थी कि ज़िन्दगी में लाल issuzu  कार से जायदा  stability  ज़रूरी है. जब तक समझ आया तब तक मंजिले ख्वाब बन के रह गयी।

आज जब भी निष्ठा को देखता हूँ तो खुद का आईना ही नज़र आता है. पर आज एक बात समझ आयी है , कि इंसान को नाम और पहचान चाहे छोटी रखनी पड़े , मगर खुद कि रखनी चाहिए।

ज़रूरत चाहते रखने कि नहीं है , बल्कि ज़रूरत चाहतों कि इन्तहा को समझने की है।  इंसान कि खवाइशों कि कोई इंतिहा नहीं होती. ये तो उस पतंग कि तरह होती है कि ज़रा सी हवा भी लग जाए तो ये इंसान को ही हवा में उड़ाने लगती हैं।

समझना होगा निष्ठा को कि ख्वाबो से बड़े उसूलों को रखना चाहिए।  अगर आप अपने उसूलों के साथ सफ़र पे चलोगी तो मंजिल तक ज़रूर पहुँचोगी।  नहीं तो दुनिया की इस अलाव में रोज़ जलना पड़ेगा और खुद के सपनो का जिंदगी भर पीछा करना पड़ेगा।

समझना होगा उसको कि अपनी एबिलिटी ( क़ाबलियत ) के साथ  जिंदगी में स्टेबिलिटी (ठहराव ) की भी ज़रूरत है। पर एक पड़ाव पे ठहरना नहीं है , बल्कि गुज़र जाना है।    समझना होगा उसको कि बड़ा बनने के लिए उसको छोटे छोटे कदम उठाने होंगे. जिंदगी के सफ़र में गर वो शिकायते दर्ज करवाने जायेगी तो उसको सिर्फ कतारें ही मिलेगी।  गर उसको शिकायत करनी है तो सिर्फ खुद से करनी सीखनी होगी।

जिंदगी में हर रोज़ गर नये दिये जलाने हैं तो उसको दिल के कोने में छुपी हुई उम्मीद कि लों को बुझने नहीं देना है।  नासमझी करने से नहीं, खुद से उम्मीद न रखने से डरना है उसको।  जिंदगी की उलझनों से जल्द से जल्द सुलह करना सीखना होगा उसको , नहीं तो जिंदगी के पडावों को मंजिल समझ के जिंदगी के सकून को खोना पड़ सकता है।

आम तौर पे आधी ख्वाइशों को हम अन्दर ही मार लेते हैं , और आधी को ज़माना मुक्कम्मल होने नहीं देता।  अपनी खवाइशों की लों को बुझने मत दो पर इतना खुदगर्ज़ न बनो कि दूसरों कि खवाइशों को कबूल न करो।  जिंदगी में खुद को इतना भला भी न बनाओ कि कोई आपको तवज्जो न दे , और इतने बुरे भी न बनो कि हर तरफ आपके ही चर्चे हों।

ये दुनिया बहुत बेरहम है।  गुजारिश करनी है तो खुद से करनी होगी।  बीत जाने से पहले हर लम्हा को जीना होगा तभी तुम्हारे वजूद का अहसास दुनिया में होगा।  जिंदगी का सफ़र में उनको साथ लो जिनके साथ चल के सकून मिले। ज़रूरी नहीं जिनके साथ ताल्लुक हो उनके साथ चलो।  और ख्याल रखना क्यूंकि मौज में इंसान औकात क्या मौत भी भूल जाता है।

आखिर में एक बात याद रखना , कभी जिंदगी का मज़ाक नहीं बनाना क्यूंकि जिंदगी सिर्फ मौका देती है धोखा नहीं !

अतुल







Wednesday, 3 June 2015

मन

बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने का मन किया . मन भी बड़ा ही अजीब है ना . अपने हिस्साब से हमको ढालने की कोशिश करता रहता है . ईश्वर ने हमको सही निर्णय लेने के लिये दिमाग और मन दोनों दिए है . पर हम सुनते जायेदा अपने दिमाग की हैं.

अजीब लगा ना . सबको लगता है की हम अपने अपने मन की सुनते हैं . जो मन करता है वोह करते हैं . पर असल में हम अपने दिमाग की सुनते हैं और उसी का अनुसरण करते हैं. मन कभी भी आपको नहीं भटकाता . भटकते आप खुद हैं अपने दिमाग की आवाज़ सुन कर . जैसे आपको सिगरेट पीने की आदत है . याद करो की पहली बार कब और किधर पी थी . दोस्त ने बोला , " यार एक सुट्टा लगा ले क्या फर्क पड़ेगा " . लगाया क्या आपने ?

मन ने बोला , नहीं कोई देख लेगा , गलत है . पर आपका दिमाग बोला " क्या फर्क पड़ता है एक सुटे से . आप समझते रहे की आपके मन ने बोला की सिगरेट पी लो कोई फर्क नहीं पड़ता . पर असल में ये आवाज़ आपके दिमाग की थी . मन ने तो एक महीन सी आवाज़ में मना किया था.

असल में हमको शोर मचाने की बड़ी आदत है .हर चीज पे शोर मचाते है हम. दिमाग की आवाज़ भी शोर मचाती है . मन की आवाज़ महीन सी होती है जिसको हम सुनते ही नहीं .

पहली बार पापा की जेब से जब पैसे चुराए थे तो आपके मन में डर था , की पकडे गए तो ?  नहीं , ये गलत है . नहीं करना चाहिए ये . ये सब आपके मन ने बोला . पर आप सुनते ही किधर हो . अपने आप को खुद का राजा समझते हुए आपका दिमाग इन सब आवाज़ को दबा देता है .

आप वोही करते है जो आपको आसान लगता है . पर मन  आपको मुश्किल रास्तों की तरफ धकेलता है . कमज़ोर है हम ना . सो आसान रास्ते की तरफ पैर खुद बे खुद उठ जाते हैं.

सो आज जब मन ने बोला की बहुत हो गया जिंदगी की चक्की में पिसते हुए , खुद को कहीं इस बेदर्द भीड़ में खो देना. आवाज़ अच्छी सी और अपनी सी लगी आज. क्यूँ लगी आज मन की आवाज़ अपनी सी ?

पता नहीं , पर सोचा अब से अपनी जिंदगी के कुछ लम्हे खुद के लिये भी निकालेंगे खुद  से ही बातें करने को . कुछ सुनेगे और कुछ सुनायेंगे . सुनेंगे मन की और सुनायेंगे खुद को .  हसेंगे खुद के उप्पर और हसाएंगे खुद के ही साथियों को .

आज के लिये इतना ही . रात भी काफी गहरी हो गयी है . अब सोते हैं और सपनो में खोते हैं .

खयाल ए ज़िंदगी पर...जीने की तमन्ना जाग उठी..
आ चले अब मियादे .... जिंदगी जितनी

अतुल " अकेला "

Tuesday, 25 September 2012

अपने

आज सुबह जल्दी 7 बजे ही उठ गया। ..... जी हाँ बहुत कम ही मैंने सुबह के 7 बजते देखे हैं। अब नींद टूट ही गई तो सोचा आज ज़रा बीवी को भी खुश कर दे सो चल पड़ा घर के सामने वाले उद्यान में। अभी 3 चक्कर ही लगा पाया की पीछे वाले गर्ग साहिब की खुरदरी आवाज़ से ध्यान बंट  गया। गर्ग साहिब अपने सपुत्र के साथ टहल रहे थे। यकायक ही उन पर नज़र पड़  गई और नज़रे मिलते ही शिष्टाचार वश राम- राम भी हो गई।

नहीं बेटा , गर्ग साहिब फिर बोले, अभी नहीं !
पापा , मेरे दोस्त के पापा ने बुक करवा दिया है ..... मैं तो उस पुराने के साथ INSULT  feel  करूँगा .
तो ...... गर्ग साहिब बोले ...... अभी 4 महीने पहले तो ले कर दिया है , दसवी पास कर ले .... उसके बाद।
नहीं पापा .... वोह मेरे दोस्तों के बीच सबसे बड़ा हो जाएगा। मान जाओ न पापा ............ plzzz , बेटा अपनी जुबान में इतनी मिठास और विनय से बोला की हर कोई पिघल जाए।

गर्ग जी , मैं बोला , क्या चाहिए रमण को ......

कुछ नहीं कथूरिया जी , वोह आया है न नया I -PAD , बस उसकी फरमाइश है बरखुरदार की . फिर कुछ सोच कर रमण को बोले , चल अब तू मुझे सैर करने दे , कल ले दूंगा।
रमण ख़ुशी में चिल्ला कर अपने पिता को thank you  बोल कर भाग लिया घर की तरफ जैसे उसका कोई operation  complete  हो चूका हो। उस 16 साल के लड़के के चेहरे की चमक देखते ही बनती थी। और उस चमक  की  चमकाहट  में गर्ग साहिब के चेहरे में बेटे के प्रति वात्सल्य उमड़ पड़ा .

कथूरिया जी , गर्ग साहिब मेरी तरफ मुताफिक हो कर बोले , हमारे बच्चे जब अन्दर से खुश होते हैं तो दिल में एक ढंडक सी होती है। अब इतना काम करते है , मेहनत  करते है , किसके लिए ? , गर्ग साहिब अपने ही रौ  में  बोलते चले जा रहे थे , इन बच्चो के लिए ही न ?  क्यूँ कथूरिया साहिब ? जैसे गर्ग साहिब मुझसे अपनी बात के  लिए सहमती मांग रहे हो मेरी।
हूँ ...... इतना ही बोल सका मैं , और अपने कदम थोड़े तेज़ कर लिये .

जितनी तेज़ी से पैर चल रहे थे उस से 1000 गुना तेज़ी से दिमाग में विचार। अभी 3 महीने पहले ही की तो बात है जब गर्ग जी ने रमण को उसके जन्मदिन पर उपहार में I -PAD  दिया था। वोह इतनी जल्दी पुराना पड़  गया . या बच्चे की जिद के सामने गर्ग जी ने समर्पण कर दिया ....... क्यूँ ?....... प्यार के लिए ....... पर यह कैसा प्यार , जो आप को किसी का अपना बनाने की बजाये उसको अपने से दूर ले जाए .

बिलकुल , गर्ग साहिब अनजाने में अपने रमण को अपने से दूर ले जा रहे हैं . प्यार की और लाड़  की परिभाषायें  ही बदलती जा रही है। आज कल माता पिता का अपने बच्चो के प्रति प्यार कभी कभी खुद को समाज के सामने अपनी प्रतिष्ठा को दर्शाने का मोका बन जाता है।
हम अपना परिवार से ही अपने समाज का निर्माण करते हैं। पर क्या हम ऐसा समाज देना चाहते है देश को , जिसमे हम सबको अपने प्यार या इज्ज़त को अपनी खुद की प्रतिष्ठा के तराजू पर तोलना पड़े . हम अनजाने में ही अपनी भावी पीड़ियो  की जड़ो को कमज़ोर कर रहे हैं। हम उनको सिर्फ इस काबिल बना रहे है की जिस चीज़ की तृष्णा हो , उसको किसी भी तरह से हासिल करो। बल्कि हमको उनको हासिल करने की मानसिकता से निकाल कर अपनी खुद की काबलियत को improve  करना सिखाना चाहिए।

यह हासिल करने की मानसिकता की वज़ह से ही आज हम अपनी अन्दर की ख़ुशी को कहीं खो चुके है। हम अपने बच्चो को किस तरह की ख़ुशी देना चाहते हैं , यह तय हम ही कर सकते हैं। परन्तु हम खुद इतने स्वार्थी हैं की हम वोह ही तय  करते हैं जिसमे हम को खुद प्रसन्ता  मिलती हो।

आजकल किसी भी तरीके से प्राप्त की हुई सम्पनता ही ख़ुशी का पैमाना बन चूका है . नैतिक मूल्य या अच्छा चरित्र की ज़रूरत अब पीछे हो गई है। सोचता हूँ की हम अपनी भावी पीड़ी को क्या दे कर जा रहे है ?
आज अगर महतवपूर्ण है सिर्फ खुद की सम्पन्ता। ज़रूरी है यह , बहुत ज़रूरी है , परन्तु इसके लिए जो हम कीमत चूका रहे है , क्या वोह सही कीमत है?

हम अपने बच्चो की अगर हर छोटी , सही या गलत, बात मानते गये , यह सोच कर की हम किसके लिए इतना काम कर रहे हैं , तो हम अनजाने में उनको कमज़ोर ही बना रहे है। बच्चो को देना कोई बुरी बात नहीं है , बल्कि तरीके से और सही समय पर देना जयादा महत्वपूर्ण है।

नैतिकता या सामाजिक मूल्यों की समझ बचपन की कच्ची उम्र में ही विकसित होती है। आजकल युवाओं में काबलियत की परिभाषा सिर्फ यह है की आपके पास कितनी information  है different  new  products  की . कारे , मोबाइल , music  systems और नये  नये  गजेट। पूरी की पूरी जिंदगी बिताने को तैयार है इन चीजों के लिए। अगर सच बोलू , अधिकतर युवा आजकल पड़े लिखे जाहिल हैं , जिनको जीवन की असली हकीकत का कोई आभास नहीं। रिश्तों की कोई अहमियत नहीं, अगर अहमियत है तो सिर्फ खुद की। स्वार्थ का चश्मा लगा रखा है।

रिश्तों की गर्माहट क्या होती है, एक छोटा सा उदहारण देना चाहता हूँ . CA  की शिक्षा प्राप्त करते हुए कई साथी बने। उनमे से मेरे 2 दोस्त राजीव और संजीव आज भी इतने करीब है की 6 महीने या साल न भी मिले पर जब भी मिलते है उस गर्म्हाट के साथ जैसे हर हफ्ते मिलते हो। परन्तु कुछ साथी ऐसे भी है जो सिर्फ ज़ेहन में है पर कभी मुलाक़ात नहीं हुई जिंदगी के सफ़र में।

अचानक एक ऐसे ही मेरे साथी को किसी तरह से मेरे होने का पता चला इस धरती पर। जिस industry  में मैं हूँ , उसी industry की ऊँचाई  पर है वोह। बहुत छोटा हूँ मैं उसके सामने, पर उसने बिना कोई समय गवाये  मुझे न सिर्फ फ़ोन किया बल्कि अपने ऑफिस में बुलाया मिलने के लिये .एक पल भी नहीं सोचा उसने कि , कहीं मैं कोई advantage  ना  लेना शुरु कर दूँ . हम मिले , उसी गरमाहट  से , जिस से हम 20 साल पहले मिलते थे, घर गृहस्ती की बाते की , पर साथ में उन पलो को याद किया जिनको याद करके दिल थोडा बच्चा हो जाता है।

मैंने भी उसके बाद कभी कोशिश नहीं की उसकी company में किसी बिज़नस के लिये। यह सोच कर की कहीं सरदार को कोई प्रॉब्लम न हो जाए। आज भी ज्यादा बातें नहीं होती, मेरी ही  हिचक है , कहीं गलती से भी यह message  न चला जाए की कोई advantage  लेने की कोशिश कर रहा हूँ। पर मालूम है की अन्दर से रिश्तों की गर्माहट उतनी ही है।  किधर मिलते है ऐसे दोस्त ? बहुत कम ............

पर आजकल , रिश्ता वोह ही कामयाब है , जिसमे हर रिश्ते की कोई न कोई कीमत हो। अधिकतर युवा आजकल रोजाना आने वाले हालातों में सही निर्णय नहीं ले पाते। इसकी वजह यही है की हमने बचपन से ही उनमे सही चरित्र , दृढविशवास , विनर्मता और आत्मअनुशासन की अहमियत का अहसास नहीं करवाया।
उनकी हर इच्छा को प्यार और लगाव का हवाला दे कर पूरा किया, जिससे वोह थोड़े से अंदरूनी तौर पर कमज़ोर हो गए है।
हमे अपने बच्चो में हासिल करने की प्रवति नहीं , बल्कि प्राप्त करने की प्रवति विकसित करनी चाहिए। प्राप्त करने का मतलब है की वे खुद में आत्मस्वाभिमान लाये, और अपने हर उस लक्ष्य को प्राप्त करने का अनुभव विकसित करे जिससे वोह खुद अपने आप में एक मूल्यवान इंसान बने। इससे उनमे वोह शक्ति आयेगी  जिससे वोह अपनी आकंशा पर नियंत्रण करना सीख पायेंगे और कभी निराशा में नहीं डूबेंगे।

आसान लगने वाला रास्ता वास्तव में मुश्किल भी हो सकता है। बच्चे हमसे ही सीखते हैं सो हमारी जिम्मेवारी  जायेदा है उनका सही निर्माण करने में।
 एक कहानी याद आ रही है। एक छोटी सी लड़की हमेशा सबसे मीठा बोलती थी। सब उसकी मिठास से प्रभावित थे। किसी ने पुछा , तुमको यह तहज़ीब किसने सिखाई। लड़की बोली , किसी ने नहीं , मेरे घर में सब ऐसे ही बोलते है।
जैसे हम घर में दूसरों से वयवहार करेंगे , बच्चे भी वैसा ही करेंगे। बच्चो के उप्पर सबसे जायेदा  असर घर और school  के माहोल का होता है। अत: हम जिम्मेवार है सही school  के चुनाव में और घर के माहोल को बनाने में।
अपने बच्चो का सही विकास करना है तो ज़रूरी है की हम उन पर दुगना समय लगाये  और पैसा आधा ! बच्चो को रोज़ प्रेरित करने की जिम्मेवारी हमारी है जिस से उनमे सही विचार , संस्कार , अनुशासन , आत्मविशवास और नैतिक मूल्य का प्रवाह हो। रोज़ उनसे बाते करने से न सिर्फ उनकी जिज्ञासा शांत होगी बल्कि वोह आपके ज्यादा  करीब होंगे।
अगर हम उनको बाहारी  रूप से प्रेरित करेंगे तो वोह खुद बे खुद आंतरिक रूप से प्रेरित होंगे जो उनको खुद के सम्पूर्ण होने का अहसास दिलाएगा। हमको उनको यह नहीं सिखाना की " जो अच्छा  लगे वोह करो " परन्तु उनको बताना चाहिये  की जो ज़रूरी है वोह करना पसंद करो
.उनको जिम्मेवार बनाओ खुद के लिए,  परिवार के लिये , अपने काम के प्रति , अपने देश और समाज के प्रति और अपने भविष्य के प्रति। 
उनको मितव्यता का महत्व सिखाने की जिम्मेवारी हमारी है, इस से उनमे self control की भावना विकसित होगी। दिशा मिलेगी उनको दूरदर्शिता के साथ जिंदगी जीने की,  और उन्ही की जिंदगी में उनको पूरणता  का अर्थ समझ में आयेगा .
हमारे बच्चे ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है और सबसे बड़ी कमजोरी है। अत: हमारा कर्तव्य है की हम उनको अपनी प्रतिष्ठा दिखाने का जरिया न बनाये,  नहीं तो वही  बच्चे हमारी खुद की दुर्दशा का कारण बन जायेगे।

मेरे दादा जी ने मुझे एक चीज़ सिखाई थी : राजू, जब भी तुम कुछ खरीदने जाओ तो खुद से तीन सवाल करो ;
पहला: क्या मैं इस को खरीदने में खुद समर्थ हूँ ? कहीं मैं दुसरे के धन का इस्तमाल तो नहीं कर रहा हूँ।
           अगर इसका उत्तर हाँ में मिले तो खुद से दूसरा प्रश्न पूछो
दूसरा : क्या मुझे इसकी वास्तव में ज़रूरत है ? अगर इस का उत्तर भी हाँ में मिले तो आखिर में खुद से पूछो
तीसरा : क्या इसके बिना मेरा काम चल जायेगा ? और इस प्रश्न का उत्तर अगर "न" में मिले तो उस वस्तु  को      बिना  देर किये खरीद लो।

पर इसका मतलब यह नहीं की आप हमेशा ऐसा करो , कभी कभी खुद की और दुसरे की खुशी  के लिए आप थोडा सा, खुद को, वक़्त के हिसाब से बदल सकते हो। मन की प्रसन्ता  भी उतनी ज़रूरी है जितनी की मित्वयता
आप सेल्फ कण्ट्रोल से मितव्यता और मन की ख़ुशी में balance  बेठा सकते हो।

ज़रा सोचिये की आप अपनी संतान को क्या देना चाहते है ?  आपके पास सिर्फ 2 विकल्प हैं

हासिल करने की प्रवति या प्राप्त करने की क़ाबलियत !

अतुल




Sunday, 16 September 2012

नौटंकी

ऑफिस से घर आते हुये अचानक घंटी बज उठी अपने मोबाइल की. मोबाइल उठाया तो देखा अपने ही करीबी का फोन है. थोड़ी सी मुस्कराहट आ गई थके हुए मेरे चेहरे पर और मन ने खुद से ही पूछ लिया, " कि आज इतनी रात को कैसे याद कर लिया इसने ? "

जैसे ही कॉल receive किया , तो हमारे मित्र ने बम  फोड़ दिया। ओये यार तेरे डीजल  की कीमत बाद गई आज , आवाज़ में एक ऐसी उतेजना जैसे की राहुल गाँधी सरकार में शामिल हो गए हो।
मैं बोला, " अच्छा ! ...... कब ? ... साहेब का जवाब आया .... अभी आज रात से 5 रुपए बाद गया बेटा जी .

ओह !  मुह से बरबस ही निकल पड़ा। मैंने बोला यार .... चल ठीक है यह तो होना ही था , पर तू इतना क्यूँ उछल रहा है ? ..... और यह क्या मतलब तेरा कि  " मेरा डीज़ल? " .
अबे तेरी डीज़ल कार है ना। "आवाज़ की उतेजना थोड़ी और बाद गई।" तू आज रात को ही अपनी फुल करवा ले।

अच्छा साले अब समझ में आया तेरी पेट्रोल की गाडी है तो तुझे ख़ुशी हो रही है की सिर्फ डीज़ल ही बड़ा है, मैं बोल उठा !   उधर से हसी की आवाज़ आयी जिसमे थोडा वयंग्य और संतुष्टि का भाव भी था। हो भी क्यूँ ना पेट्रोल कार चलाने वालो ने दर्द भी बहुत झेला है।  .... और इधर उधर की बाते कर और दुआ सलाम कर के हमने फ़ोन काट दिया और अपनी गाडी का रेडियो को चालु कर दिया।

इधर रेडियो का संगीत बज रहा था और उधर दिमाग की calculation . कितना खर्चा और बड़ गया .... महीने का 1800 किलोमीटर ....... 100 लीटर डीज़ल ...... चलो महीने का 500 रुपए और  गये .
और ऑफिस के महीने के 6-7000 और खर्चा बड़  गया ...... चलो कोई बात नहीं, अपनी interlining के रोल की थोड़ी कीमत बड़ा देंगे। बस दिमाग की calculation करते हुए कब घर आ गया की पता ही नहीं चला।
घर के अन्दर कदम रखा ही था, की पापा के कमरे में पड़ोस के aggarwal  साहिब बैठे मिल गये . चर्चा का विषय वही था। मुझे देखते ही अंकल के चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गई और बोले " राजू टंकी फुल करवा ली क्या ?
समझ में नहीं आ रहा की यार मेरी टंकी के फुल होने मे  क्या रूचि है? शायद एक वयंग्य है की देख बेटा इस बार तेरी बारी आ गई ( पहले सिर्फ पेट्रोल के दाम जादा बड़ते थे) वैसे अजीब सी बात दीखती  है हर बार जब भी पेट्रोल और डीजल    के रेट revise  होते हैं। हर बार जैसे ही सूचना  मिलती है , पेट्रोल पम्प पर वोह लम्बी लाइन गाड़ियों की। जैसे आज ही सब ले लेंगे पुरे साल का।
अरे भैया, रेट बड़ा है सिर्फ 3-7 रूपए, और टंकी फुल भी करवा लोगे तो बचेगा अधिक से अधिक 200-300 रुपए। इतनी लम्बी गाडी के मालिक और दिल इतना कमज़ोर ? भैया , इस महीने एक पिज्जा कम मंगवा लेना , बच जायेंगे 300 रूपए और सेहत भी रहेगी बरकरार। पर कौन समझाए ?

धकमपेल मच जाती है पम्प पर। सरकार को कोसते हुए, होर्न बजाते हुए, लगे होते है लाइन में , आधा घंटा और खड़े खड़े 1 लीटर तेल बर्बाद कर देते हैं। नौटंकी तो टीवी पर भी चालु हो जाती है। लग जाता है पूरा विपक्ष वाली पार्टियाँ सरकार को कोसने में, जैसे दर्द तो सिर्फ उन्ही के दिल में है लाइन में लगे लोगो के लिए। टीवी के सामने ओ बड़ी बड़ी बाते , वोह लेक्चेर  और दलीले की सर  चकरा जाए। भारत बंद का ऐलान हो जाता है, साथी पार्टियां समर्थन वापस लेने की बाते करती हुई दिखाई देती है फिर बाद में मुकर जाती है अपनी नयी दलीलों के साथ। सबसे मजेदार दलील तो यह होती है इन लोगो की " हम आम आदमी का दर्द समझते हैं और हम सरकार से अनुरोध करते है की आम आदमी को कुछ राहत दी जाए, परन्तु हम सम्प्रदायक ताकतों को रोकने के लिए अभी सरकार  के साथ है "
साइकल के साथ पदर्शन शुरू हो जाता है। चलो इसी बहाने यह नेता लोग साइकल या बैलगाड़ी की सवारी का आनंद भी ले लेते है और हमारी एक दिन की ऑफिस की छुट्टी का भी इंतजाम हो जाता है।
सरकार वाले भी चालु हो जाते है अपनी दलीलों के साथ . और टीवी वालो का TRP भी कुछ सुधर जाता है कुछ दिनों की बासी खबरों के बाद। नहीं तो टीवी पर पर्सारण  क्या करे यह सोचना पड़ता था टीवी वालो को,  असली खबरों के अभाव में। उनके लिए तो यह सूखे के बाद की बरसात होती है बिना किसी चिंता के की आम लोगो की जेब थोड़ी और सुखने लगी है। और आम आदमी भी लग जाता है टीवी के सामने इस उम्मीद में , की शायेद कुछ कम हो जाए रेट।
आम आदमी ऐसे सुनेगा टीवी की चर्चा, चैनेल बदल-बदल कर, जैसे सब विपक्षी दल के और टीवी वाले उसके लिए ही तो चिल्ला रहे है। पर उस बेचारे को क्या मालूम वोह सब उसीकी बेबसी और मजबूरी के गर्म चूल्हे पर अपनी रोटिया सेक रहे है।

जब कोई विपक्षी दल का नेता टीवी पर चिलायेगा और फ़ालतू की दलीले देगा , तो घर में टीवी के सामने बैठा हुआ यही आम आदमी अपनी गर्दन हिला कर ऐसे अनुमोदन करेगा जैसे वोह भी लाइव हो। क्या करे बेचारा, बात तो उसी के दिल की है ,र कोई और कर रहा है टीवी  पर,अपने खुद के लिए नया वोट  बैंक बनाने की कोशिश में।

अगले दिन फिर अखबार वालो की नौटंकी चालु हो जाती है। ओ पूरा का पूरा पहला पन्ना काला हो जाता है सरकार को कोसने में। पर इस सब के पीछे का जो काला सच है वोह सामने नहीं आ पाटा किसी के सामने।
सच यह, की भर्ष्टाचार की वजह से जो अपने देश की currency  कमज़ोर हो रही है, उस वजह से आयात महंगा हो गया है और कीमत बदानी पड़  रही है। मोटे सेठ लोगो की तिजोरी भर जाती है इस वजह से और कीमत आम आदमी चुकाता है। इस सब के पीछे काला धन और बढता हुआ corruption  है पर कौन कहे इन बहरे कानो में।
 इस के बारे में हम जादा नहीं बोलेंगे क्यूंकि इसके लिए हमने केजरीवाल जी को appoint  किया हुआ है।

अंत में नौटंकी जब ख़तम होती है तो 50 पैसे या 1 रुपए की कीमत कम हो जाती है। साथी दल सरकार के वाही वाही लुटने में लग जाते है और विपक्षी दल इसको आम जनता के साथ धोका या मज़ाक बताने में कोई कसर  नहीं छोड़ते। फिर अगले 3-4 दिन तक टीवी वालो की दूकान भी चल निकलती है। सब के सब चीखने और चिल्लाने में लग जाते है और हम यह सोच कर हैरान और परेशान होते रहते है की " ऐसा कब तक? "

और आम आदमी यह सोच कर संतोष कर लेता है हमेशा की तरह कि  " Something is better then nothing"  .
और लग जाएगा जुगाड़ करने में की इस बड़े खर्चे को कैसे अपने बजट में adjest  किया जाए। क्यूंकि नेता की नज़र में वोह तो सिर्फ वोटर है।

वैसे भी " Beggers can,t be chooser "






Tuesday, 11 September 2012

चलत-फिरत दूरभाष यंत्र की महिमा

अभी हम सोच ही रहे थे की आज क्या लिखे की अचानक कानो में मधुर सी ध्वनि बज उठी। ध्वनि तो मधुर थी पर इतनी रात को बजी तो दिमाग में कटुता आ गई।

यह चीज़ ही ऐसी है , न बजे 15 मिनट भी, की बार बार अपने हाथ के अंगूठे से इस की छाती थपथपा कर ऐसे देखते हैं की जैसे डॉक्टर हमारी छाती पर अपना यंत्र लगा कर चेक करता है की सांस हमारी चल रही है या नहीं।

भाई आजकल तो अपनी साँसों से जादा इस यंत्र की सांस जायदा महत्वपूर्ण है। हमारी साँसे उखड जाए पर इसकी साँसे उखड जाए( सिग्नल कमज़ोर हो जाए) तो अपनी जान आफत में आ जाती है . वैसे बड़े कमाल की चीज़ है यह।  आज कल तो हर काम इस से पूरा हो जाता है। व्यापर में आर्डर लेना हो या आर्डर पूरा करना हो, कहीं फस गए हो एक दम से मदद की सूचना दे दो, हर गम और ख़ुशी को बांटने में एक दम आगे , पर एक काम में तो यह बड़ा मददगार है , और वोह है इश्क के इज़हार में।

एक ज़माना था , जब किसी लड़के को कोई लड़की पसंद आती थी , वोह सुबह सुबह उस के घर के सामने खड़ा हो कर उसके आने जाने का समय note  करता था ताकि बाद में सही मोका मिलने पर उसको अपने दिल की बात को इज़हार कर सके। वोह तो उसका बस नहीं चलता था , नहीं तो लड़का तो लड़की के baathroom  जाने के समय  नोट कर लेता। वोह भी क्या सीन होता था। घर के सामने खड़ा हो कर वोह लड़का हर उस इंसान के सामने ऐसे behave  करता था की उस जैसा कोई शरीफ नहीं। अगर घर के सामने कोई सब्जी की दूकान हो तो उस सब्जी वाले की आमंदनी बढाने में उसका contribution को कौन नज़रंदाज़ कर सकता है। कोई भी निकलता उस घर के आसपास से  , उसको अपनी colgate  smile  दिखा कर ऐसे कंधे झुका लेता जैसे आज ही काला मंजन कर के आया हो। 3-4 printed  शर्ट को बदल बदल कर पहनता की लगे की रोज़ नई  ली है। दोस्त की motorcycle या scooter  ले कर बार बार ऐसे निकलता की पता नहीं की बापू ने बाज़ार के कितने काम दे दिए हो। घर के सामने general  store  की दूकान के सामने इंतज़ार करते हुए कितने ही campa cola या thril के साथ rimjhim पीते  हुए अगर कोई लड़की के पड़ोस की आंटी अपने पप्पू के साथ दूकान पर आती तो बड़े प्यार से पप्पू को " ओह कित्ता पाला बच्चा  है कहते हुए गोद  में उठा लेता" जैसे प्रक्टिस कर रहा हो होने वाले वक़्त के लिए। और पप्पू ने गोद में उठाते ही पानी गिरा दिया अपने निक्कर से तो  , मज़ाल  है की colgate smile  थोड़ी सी भी कम हो जाए।

पर आज , यह सब कष्ट उठाने की ज़रूरत नहीं है। बस यह यंत्र सहायक है दिल की आवाज़ पहुचाने के लिए। और अगर सुर से सुर मिल गया तो एक दुसरे के दीदार करने के लिए कोई ज़रूरत नहीं कहीं भी जाने की, बस MMS  भेज दो। क्या ज़रूरत है दोस्त से गाडी मांगने की और police  को गांधी देने की ( भाई अकेलेपन की कीमत भी तो देनी पड़ेगी ) । देखा कितना समय और पैसा बचाता है यह यंत्र। पहले हर बार नया diolog  सोचना पड़ता था लड़की को impress  करने के लिये , पर अब तो एक ही मेसेज फॉरवर्ड कर दो ...वक़्त बचा .  और मज़ा तब जब सुनीता को 10 मेसेज आये 10 लडको से, और सब के सब same .  इसलिए कहते हैं भारत में विविधता में ही एकता है। सही तो है " की जो तेरा  है .....  वोह मेरा है , और जो मेरा है वोह तेरा।

कंपनिया भी समझदार हो गई हैं . एक के पास मेसेज आएगा की साईं बाबा या हनुमान जी की कृपा है आप पर , और आप को यह मिलेगा या वोह मिलेगा और सिर्फ आपको ही मिलेगा  , बस इस को फॉरवर्ड कर दो 10 दोस्तों को। लग जायेंगे सब के सब फॉरवर्ड करने में। और हनुमान जी और साईं बाबा जी confuse , की भाई किस किस को पहले फायेदा पहुंचाए। जब तक हनुमान जी सोचे एक के बारे में की इसको क्या वरदान दे , वोह वरदान फॉरवर्ड हो गया 10 और लोगो में। 10 से 100, 100 से 1000 और फिर लाख ....... अब हनुमान जी कितने वरदान दे और किस किस को दे ..... बेचारे हनुमान जी परेशान। सब के सब परेशान की वरदान नहीं मिला और हनुमान जी परेशान की इतने वरदान किधर से लाये, पर कंपनियों को वरदान मिल गया।।  देखा यह है इसकी महिमा की भगवान् भी चकरा जाये .

जिधर देखो, बस में, रेल में, मेट्रो में, हर जगह लोग कान में इस यंत्र के साथ तार लगा कर नज़र आयेगे। और कुछ तो अजीब सी मशीन लगा कर घूमते है जैसे कान से उंचा सुनाई देने पर लगाते हैं। हर कोई अपने आप में मस्त, अकेला और company  चिल्ला चिल्ला कर सुना रही है की " हर एक फ्रेंड ज़रूरी होता है" 

बिलकुल ठीक हर एक फ्रेंड ज़रूरी है अब। लड़की को ज़रूरत है अपने friend  की ..... ताकि recharge  हो जाए, लड़के को ज़रूरी है ताकि बापू के पैसे कुछ काम आ जाये।

मोहेल्ले के पार्क में घूमते हुए कई आंटीयां एक दुसरे को अपने अपने  यंत्र को ऐसे दिखाती है जैसे अपने सोने का सेट दिखा रही हो। सोने का सेट तो दिखा नहीं सकती, क्यूंकि वोह तो कोई खींच कर ले जाएगा कोई मुआ अपनी गर्लफ्रेंड के मोबाइल को recharge  करवाने के लिए। सो मोबाइल ही दिखा कर अपनी हैसियत दिखाई जाए। आती तो पार्क में है सैर करने को की थोड़ी कमरिया लचकीली हो जाए, पर एक दो चक्कर लगा कर बैठ जायेंगी बीच पार्क में। चर्चा का विषय  कोई हो , पर एक भी नया मॉडल कोई ले आये, तो सबके बीच में आकर्षण का केन्द्र  वोह ही बनेगी। अर्रे  सपना बड़ा ही बढ़िया है यह तो ! " कौनो मॉडल है यऊ  !...... अरे भाभी , इन्होने दिलवाया है हमको , थोड़ी सी लजाते हुए बोली सपना जी, पर वाणी में अजीब सा अहंकार भरी गूंज।

भाभी andrude  वाला फ़ोन है। इस में ना , बहुत सारे फीचेर  हैं।।।।।। यह है वोह है , ऐसा है।।।। वैसा है ..... पता नहीं क्या है ..... और बाकी आंटीयां उसकी बाते सुन कर ऐसे मुह बना रही होती हैं जैसे घर जाते ही पतिदेव पर चढ़ जायेंगी बेलन ले कर। चाहे सपना के मोबाइल में 10 रूपए न हो, मिस कॉल मार मार कर लोगो से बात करती हो, पर फुनवा तो S -3 ही होगा तो मज़ा आएगा।

जिंदगी ही बदल दी इसने। इंसान को पहचानने और समझने का नजरिया ही बदल डाला इसने। अब क्या क्या लिखे इस की महिमा के बारे में , जितना लिखे या बोले कम है। जिसके पास यह नहीं, उसका जीवन ही व्यर्थ। अगर यह नहीं है आपके पास आप काबिल ही नहीं है किसी काम के।

तभी तो आजकल का नारा है ..... रोटी कपडा और ......... मोबाइल

इसकी महिमा के बारे में फिर और ज्ञान देंगे ...... अभी इतना ही।

शुभ रात्री

Saturday, 8 September 2012

वो

वैसे तो मैं अपने निजी रिश्तों के बारे में कुछ भी share  करने में विश्वास नहीं रखता पर एक इंसान के साथ मेरा रिश्ता बड़ा ही अलग सा है

सब के लिए वोह मेरी wife /पत्नी है पर मुझे नहीं मालूम की कौन है वोह और क्यूँ है वोह , मेरी जिंदगी में। . हमारे शास्त्रो  में लिखा है की पत्नी ही पुरुष को सम्पूरण बनाती है वोह एक सबसे करीबी दोस्त होती है आपके जीवन में .

जी हाँ , आज  यह मेरा लेख समर्पित है मेरी ASHI  को

कौन है ASHI ? क्या है वोह , सब की नज़र में वोह सिर्फ एक ऐसी आम लड़की है जिसकी शादी एक गुमनाम से शख्स से हुई। जिसका कोई वजूद नहीं है इस इंसानों के जंगल में। पर मेरे लिए वोह अलग है .......

कल उसके साथ जिंदगी बिताते हुए 16 साल पूरे हो जायेंगे और इन 16 सालो में आज तक मुझे उसमे कोई रिश्ता नज़र नहीं आया। मैं उसके और अपने रिश्ते को कोई नाम नहीं देना चाहता।

हमारा रिश्ता तो बस साथ चलने का है। वैसे ही जैसे नदी का रिश्ता लहरों के साथ है। बिना लहरों के नदी का कोई अस्तित्व ही नहीं।

जब Ashi  मेरी जिंदगी में आयी तो जिंदगी बिखरी हुई थी , अपने वजूद के लिए एक  संघर्ष  मे  adjustment के लिए वक़्त ही नहीं मिला। अकेलेपन की परछाई ही सबसे करीब लगती थी।  किसी की भी नज़र में मेरी कोई पहचान नहीं थी और जिंदगी मेरी सबको बोझ लगती थी।

उसके भी अपने सपने और ज़रूरते  रही होगी। एक विश्वास के साथ वोह मेरे घर में आयी होगी की इस पार उसको एक सकून भरी जिंदगी मिलेगी। पर मेरी खुद की जिंदगी में इतनी उथल पथल थी की सारे अरमान पानी में बह गए।

क्या उम्र थी , सिर्फ 24-25 साल की अल्हड उम्र . जब हर कोई एक ख्वाब देखता है खुद के लिए। पर मेरे  साथ सारे खवाब  हो  हवा हो गए खुद के . अगर खवाब बचा तो सिर्फ एक ही खवाब ........ वोह मैं।

मुझे उसने अहसास दिलाया की क्या हुआ अगर ज़मीं पथरीली है , बस चलना है अब , क्या हुआ अकेले हैं, पर  हम दो कभी अकेले नहीं हो सकते , क्या हुआ अगर वक़्त लगेगा जिंदगी को संभालने में , वक़्त की कोई कमी नहीं , क्या हुआ अगर कोई साथ नहीं, हम खुद अपने साथ हैं।

मेरे गुस्से , मेरी frustration , मेरी बेबसी और मेरे  आक्रोश को बखूबी समझा उसने। अगर आज मैं अगर खुद को जी रहा हूँ सिर्फ उसी की वज़ह से। नहीं तो जिंदगी एक रेगिस्तान हो चुकी थी।

मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ की कब वक़्त ने मुझे संभाल लिया।  उसकी मेरे सामने की खामोशी असल में एक संभल बन गई मेरे लिए। एक खामोश इंसान  कैसे जिंदगी को संभालता है , यह मैंने  उससे सीखा। अपनी कोई प्रॉब्लम नहीं share   की मेरे साथ।  बस एक अहसास दिलाती गई की सब ठीक है।  और पता नहीं चला की कब सब ठीक हो गया।   उसकी चुपी  या ख़ामोशी ही तो थी जिसने मेरे अन्दर के आक्रोश को खामोश कर दिया। नहीं तो मेरा आक्रोश और frustration  मुझे कब का तोड  चुका  होता।

उसकी    पलकों के पीछे के सारे सपने जो खुद के लिये  थे उसने अपनी पलकों के पीछे ही   छुपा लिए . मुझ से
या किसी से कोई अपेक्षा  नहीं की। बस उसकी एक ही अपेक्षा थी , मेरे साथ चलना है अब।  कैसा भी   दौर हो ,   हालात हो , बस साथ - साथ जीना है।  मेरा घर कब घर बन गया पता ही नहीं चला। वोह पल कब  बीत गए पता ही नहीं चला।

अंत में बस इतना ही ........ की एक और ऐसी ही  जिंदगी जीने का मन करता है ............






 ,

Friday, 7 September 2012

इज्ज़त का पैमाना

 मेरी तनख्वाह से आंकते हैं लोग !
इज्ज़त का पैमाना बस यही रह गया !

एक ज़माना था जब धन और सम्पति उन्ही लोगो के पास होती थी जो बुद्धिजीवी लोग कहलाते थे .

बुद्धिजीवी वोह प्राणी हुआ करते थे जो अपनी जीविका अपनी बुद्धिमता के दम पर चलाते थे। याद कीजिये कुछ सौ बरस पहले का ज़माना। जब इंसान की पहचान उसकी पगड़ी से या पाण्डित्य  से हुआ करती थी .
बादशाह अकबर के दरबार में नौ रतन हुआ करते थे जो अपने अपने फन में माहिर थे और धन और शोहरत उनके कदम चूमती थी।
उससे पहले राजा क्रिशनादित्य  के दरबार में तेनालीराम  थे , जिनको बुधि  का लोहा सब मानते थे और समृधि उनके कदम चूमती थी।

पर अब ज़माना तेनालीराम का नहीं तेलगी जैसे लोगो का है। वोह नवरतन पता नहीं किधर खो गये . इज्ज़त की परिभाषा अब आपके सम्पति और बैंक बैलेंस से है . चाहे वोह धन आपके पास कैसे आया कोई बात नहीं , आपने क्या गलत किया, कोई बात नहीं , पर अगर आप के पास लक्ष्मी है तो आप बुद्धिमान है अन्यथा आप की जगह अंतिम पंक्ति में है

अब तो यह हाल हो गया है की आपके पास सम्पति नहीं तो आपकी पत्नी के लिए भी आप एक looser हैं।

पत्नी भी आपको आपके बैंक बैलेंस या तनख्वाह की वजह से मिलती है . आप की क़ाबलियत क्या है कोई नहीं पूछता .

अरे आपकी क़ाबलियत ही आपको सम्पति और समर्धि दिलाएगी . पर कोई नहीं जान्ने की कोशिश करेगा की आप कितने शिक्षित है या समझदार हैं।

पर गम नहीं क्यूंकि ज़माना ही ऐसा है की आपको अब खुद को IMPROVE नहीं बल्कि हर कदम पर PROVE करना होता है।

समय का अभाव अब इतना है जिंदगी में की , आपकी क़ाबलियत का पैमाना या आपकी सफलता का पैमाना बस आपके
द्वारा अर्जित धन से होता है।
किसके पास समय है की आप के बुद्धिमता का आंकलन करे . पर क्या पैसा इतना महतवपूर्ण है कि  इंसान की खुद की शख्सियत धन सम्पति की एक परछाई बन कर रह जाये .

मेरे ख़याल से तो नहीं पर क्या करे आज धन के बिना जिंदगी को जीने को तो छोडो , चलाना भी मुश्किल है .
हर आदमी भाग रहा है धन के लिए ...... क्यूँ ?..... किसके लिए ?...... खुद के लिए?........ नहीं ....... वोह तो उलझ गया है इस चक्रविहू में .
 चिंता है उसको अपने बच्चे की स्कूल फीस की , चिंता है पत्नी की, फिर अंत में चिंता है खुद की। इस वजह से समाज में यह धारणा बन गई है की आप तभी काबिल है जब आप अपने बच्चो और परिवार की ज़रूरत पूरी कर सकते हो
सो क़ाबलियत की परिभाषा कब धन सम्पति बन गई पता ही नहीं लगा . आपकी बुद्धिमता के बारे में तभी मालूम चलेगा दूसरों को जब वोह आपको सुनेगे या समझेगे .

पर वोह तभी आपको सुनेगे या समझेगे जब वोह आपको काबिल समझेंगे . और आप काबिल तभी है जब आपके पास  धन है . वरना  समय किधर है किसी के पास आपके लिये .

आखिर उनको भी तो खुद को बुद्धिमान साबित करना है ........